उत्तराखण्ड

कोरोना पर काबू पाने को सरकार इसकी तेज रफ्तार का पीछा कर रही, लेकिन इस हफ्ते उलट नजारा दिखा, पढ़िए

कोरोना संक्रमण पर काबू पाने को सरकार इसकी तेज रफ्तार का पीछा कर रही है लेकिन उत्तराखंड में इस हफ्ते उलट नजारा दिखा। सरकार आगे और कोरोना पीछे-पीछे। दरअसल, कोरोना के निशाने पर अब आम आदमी के साथ सरकार भी आ गई है। पहले नंबर लगा शहरी विकास मंत्री मदन कौशिक का। एक कार्यक्रम में शरीक हुए, पता चला कि इसमें मौजूद एक युवक कोरोना पॉजिटिव था। दो दिन मंत्रीजी को क्वारंटाइन करने को लेकर स्वास्थ्य महकमा और प्रशासन असमंजस में रहा, मगर अंतत:मंत्रीजी को राहत मिल गई। शनिवार को पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज की पत्नी व पूर्व मंत्री अमृता रावत की रिपोर्ट पॉजिटिव आई। रविवार को महाराज समेत पूरा परिवार कोरोना संक्रमण की जद में आ गया। महाराज शुक्रवार को कैबिनेट बैठक में थे, जिसमें मुख्यमंत्री, मंत्री और शासन के अफसर शामिल हुए। लिहाजा अब मुख्यमंत्री, तीन मंत्री सेल्फ क्वारंटाइन हो गए, जबकि अफसरों पर फैसला होना बाकी है।

एक अनार और पांच दावेदार

कोरोना के दौर में सूबे के नए मुख्य सचिव को लेकर भी कयासों का दौर तेज है। मुख्य सचिव उत्पल कुमार सिंह की सेवानिवृत्ति नजदीक है। पांच नौकरशाह इस पद के दावेदार हैं। ये हैं अनूप वधावन, ओमप्रकाश, सुखबीर सिंह संधू, राधा रतूड़ी और मनीषा पंवार। इनमें ओमप्रकाश का दावा सबसे मजबूत माना जा रहा है। अभी अपर मुख्य सचिव हैं, दावेदारी इसलिए भी पुख्ता क्योंकि राज्य गठन से ही यहां अपनी सेवाएं दे रहे। सरकार से लेकर शासन और यूं कहें तो हर तबके में पैठ रखने वाले। इस सबके बावजूद सियासी गलियारों में यह भी चर्चा है कि मुख्य सचिव जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण पद पर सरकार केंद्र से भी किसी को भेज सकती है। मौजूदा मुख्य सचिव को भी छह महीने का एक्सटेंशन मिल सकता है। अब समीकरणों में आए इस उलटफेर ने मामला कुछ पेचीदा बना दिया। चलिए देखते हैं, ऐसे में अब किसका नंबर लगता है।

अफसर हैं या बुक मशीन

कहते हैं प्रतिभा किसी सहारे की मोहताज नहीं होती। ऐसे ही एक अफसर इन दिनों सत्ता के गलियारों में चर्चा बटोर रहे हैं। जनाब उस महकमे से ताल्लुक रखते हैं, जिस पर सरकार की ब्रांडिंग का जिम्मा है। अपने काम में कितने उस्ताद हैं, सभी वाकिफ  हैं। इनके सृजन का हुनर भी गजब का है। दरअसल, ये टी-20 अंदाज में लेखन के माहिर हैं। कोरोना महामारी के दौर में अगर किसी की दो-दो किताबों का विमोचन डेढ महीने के दौरान ही राज्य सरकार के मंत्री कर रहे हैं तो शक की कोई गुंजाइश नहीं। जब महामारी के कारण हर कोई अपने काम को तमाम एहतियात के साथ किसी तरह अंजाम देने की कोशिश कर रहा है, ये सब कुछ निबटा किताबें छापने को भी वक्त निकाल ले रहे। सुना है, अब इनकी काबिलियत की गूंज टॉप लेवल तक पहुंच गई है। बिल्कुल, हरफनमौला शख्सियत को वाजिब हक मिलना ही चाहिए।

सियासी बिसात, नहले पर दहला

विधायकों के वेतन-भत्तों में कटौती के मामले में विपक्ष कांग्रेस के नहले पर सरकार ने तड़ से दहला जड़ दिया। हुआ यूं कि सरकार ने कोरोना के मददेनजर विधायकों के वेतन भत्तों में 30 फीसद तक कटौती का फैसला किया। विधानसभा सचिवालय ने सभी विधायकों से सहमति लेने की प्रक्रिया शुरू की। कितनों ने मंजूरी दी, यह बात तो दीगर है, लेकिन महामारी के नाम पर एक नया मोर्चा जरूर खुल गया। सरकार ने कैबिनेट के जरिये इस पर मुहर लगाई तो सत्तापक्ष के विधायकों को इसे मानना ही है, लेकिन विपक्ष को मानों नया मुद्दा मिल गया। नेता प्रतिपक्ष डॉ. इंदिरा हृदयेश बिफर गईं, लाजिमी भी है। उनका तर्क है कि इतने अहम मसले पर सरकार ने पहले उनसे मशविरा क्यों नहीं किया। असल वजह है सरकार के प्रवक्ता व कैबिनेट मंत्री मदन कौशिक का वह बयान कि कांग्रेस कटौती नहीं चाहती तो नेता प्रतिपक्ष लिखित में दे दें।

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