एपस्टीन फाइल्स का साया: राजनयिक टेर्जे रॉड-लार्सन की नस्लवादी टिप्पणी पर विवाद

न्यू यॉर्क / नई दिल्ली — अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों में हलचल पैदा करने वाले एक चौंकाने वाले खुलासे में, दिग्गज नॉर्वेजियन राजनयिक टेर्जे रॉड-लार्सन (Terje Rød-Larsen) भारी विवादों में घिर गए हैं। हाल ही में जनवरी 2026 के अंत में अमेरिकी न्याय विभाग द्वारा जारी की गई जेफ्री एपस्टीन (Jeffrey Epstein) से जुड़ी फाइलों में, ओस्लो शांति समझौते के मुख्य सूत्रधार रहे लार्सन द्वारा भारतीयों के प्रति एक अत्यंत अपमानजनक और नस्लवादी टिप्पणी करने का मामला सामने आया है।
25 दिसंबर, 2015 के एक ईमेल में, जो लार्सन के ईमेल पते से एपस्टीन को भेजा गया था, राजनयिक ने कथित तौर पर लिखा: “क्या आपने वह कहावत सुनी है: जब आपका सामना एक भारतीय और एक सांप से हो, तो पहले भारतीय को मारें!”
दशकों पुराने इस नस्लवादी जुमले के सामने आने के बाद भारत और दुनिया भर में फैले भारतीय प्रवासियों के बीच गुस्से की लहर दौड़ गई है। यह खुलासा उन वैश्विक शांति दूतों के निजी पूर्वाग्रहों पर गंभीर सवाल उठाता है जो दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण संस्थानों में नीति निर्धारण का काम करते हैं।
एक दांव पर लगा करियर: ओस्लो से एपस्टीन तक
टेर्जे रॉड-लार्सन कोई साधारण राजनयिक नहीं हैं। पेशे से समाजशास्त्री लार्सन 1990 के दशक की शुरुआत में तब सुर्खियों में आए थे, जब उन्होंने इज़राइल और फिलिस्तीन मुक्ति संगठन (PLO) के बीच 1993 के ओस्लो समझौते में एक गुप्त मध्यस्थ के रूप में भूमिका निभाई थी। उनके इस कार्य पर ‘ओस्लो’ नामक एक प्रसिद्ध नाटक और फिल्म भी बनी है।
हालांकि, उनकी यह उपलब्धियां 2020 से लगातार विवादों के घेरे में हैं। लार्सन को इंटरनेशनल पीस इंस्टीट्यूट (IPI) के अध्यक्ष पद से तब इस्तीफा देना पड़ा था, जब यह पता चला कि उनके संस्थान ने एपस्टीन की संस्थाओं से 650,000 डॉलर से अधिक का दान लिया था। इससे भी अधिक चौंकाने वाली बात यह थी कि लार्सन ने खुद 2013 में एपस्टीन से 130,000 डॉलर का व्यक्तिगत कर्ज लिया था, जिसे उन्होंने संस्थान के बोर्ड से छिपा कर रखा था।
“एपस्टीन के अपराध घृणित थे। यह विचार ही कि शांति कायम करने वाला कोई संस्थान ऐसे दुष्ट व्यक्ति के साथ जुड़ा हो, हमारे मूल मूल्यों के विरुद्ध है,” 2020 में लार्सन के इस्तीफे के समय आईआईपीआई बोर्ड के तत्कालीन अध्यक्ष और ऑस्ट्रेलिया के पूर्व प्रधानमंत्री केविन रुड ने कहा था।
2026 की फाइलों में “भारत कनेक्शन”
फरवरी 2026 में जारी किए गए दस्तावेजों ने इस घोटाले में एक नया मोड़ ला दिया है। इन फाइलों से संकेत मिलता है कि एपस्टीन ने अपने उच्च संपर्कों का उपयोग दक्षिण एशियाई भू-राजनीति को प्रभावित करने के लिए करने की कोशिश की थी।
2017 के एक ईमेल में दावा किया गया है कि एपस्टीन ने भारत की एक महत्वपूर्ण विदेश यात्रा के पीछे अपनी सलाह होने का श्रेय लिया था। हालांकि भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) ने इन दावों को “एक सजायाफ्ता अपराधी की बकवास” बताकर खारिज कर दिया है, लेकिन लार्सन की विशिष्ट भारत-विरोधी टिप्पणी ने इस बहस को कूटनीति से हटाकर व्यक्तिगत घृणा और नस्लवाद पर केंद्रित कर दिया है।
नस्लवाद पर वैश्विक प्रतिक्रिया
लार्सन द्वारा इस्तेमाल की गई यह कहावत औपनिवेशिक काल की एक नस्लवादी सोच को दर्शाती है। एक वरिष्ठ संयुक्त राष्ट्र दूत द्वारा इसका इस्तेमाल किया जाना अंतरराष्ट्रीय संगठनों के भीतर गहरे पैठे ‘सिस्टमैटिक रेसिज्म’ (व्यवस्थागत नस्लवाद) के सबूत के तौर पर देखा जा रहा है।
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सोशल मीडिया पर आक्रोश: भारत में #DiplomaticRacism हैशटैग ट्रेंड कर रहा है, जहाँ लोग मांग कर रहे हैं कि नॉर्वे सरकार और संयुक्त राष्ट्र लार्सन के पिछले पदों और उनके द्वारा किए गए कार्यों से खुद को औपचारिक रूप से अलग करें।
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संस्थानों की चुप्पी: 3 फरवरी, 2026 तक लार्सन की ओर से इस ईमेल पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। नॉर्वेजियन विदेश मंत्रालय, जिसने अतीत में आईआईपीआई को 130 मिलियन क्रोनर से अधिक की फंडिंग दी थी, अब अपने पुराने जुड़ावों की जांच के दबाव में है।
वैश्विक शासन में भरोसे का संकट
लार्सन का मामला वैश्विक संस्थानों में पैदा हुए “भरोसे के संकट” का प्रतीक है। दशकों तक लार्सन “ट्रैक-टू डिप्लोमेसी” (अनौपचारिक कूटनीति) का चेहरा रहे। यह खुलासा कि इस तरह का भरोसा एपस्टीन जैसे अपराधी के साथ साझेदारी में और निजी नस्लवाद के साथ बनाया गया था, कूटनीतिक विश्वसनीयता की जड़ों पर प्रहार करता है।
जैसे-जैसे अमेरिकी न्याय विभाग शेष दस्तावेजों को सार्वजनिक कर रहा है, एपस्टीन का साया और भी कई अंतरराष्ट्रीय हस्तियों पर पड़ने की संभावना है। भारत के लिए, प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि उसकी संप्रभुता और गरिमा किसी अपराधी नेटवर्क के गंदे रिकॉर्ड्स का हिस्सा न बने।




